बिचौलिये, The Middlemen

वामपंथी दुनिया के सबसे कमीने ठग होते है।

दुनिया में बहुत सारे phenomenon, तथ्य एक साथ विद्यमान होते है। ग़रीबी, अमीरी, किसान, व्यापार, उद्योगपति, अत्याचार, बेरोज़गारी, धर्म, राजशाही, लोकतंत्र, स्त्रियों पर अत्याचार, युवाओ की आवारागर्दी, युवाओ में नशा। लेकिन इनमें आपस में कोई सम्बंध ही हो ये आवश्यक नहीं होता, या इनमें से कोई एक किसी दूसरे का परिणाम हो आवश्यक नही होता, लेकिन वामपंथी वो ठग होता है जो किसी भी समस्या को किसी भी तथ्य का परिणाम बता सकता है, व समस्या को उजागर कर रहा है तो साथ में ये दावा भी कर सकता है उसके पास समस्या का हल है। अधिकतर लोग जीवनयापन में व्यस्त होते है। उन्हें ये सुनना अच्छा लगता है कि उनकी बुरी अवस्था के लिए वे उत्तरदायी नहीं है। उन्हें ये भी अच्छा लगता है कि किसी ने समस्या उठायी तो, तो ये कुछ तो करेगा ही। और उन्हें सबसे अच्छा तो ये लगता है कि बिना कुछ किए, घर बैठे उन्हें वो अम्बानी की संपत्ति में हिस्सा मिलने वाला है।फिर वो primitive अवधारणा जो हमारे मस्तिष्क में कही गहरे बैठे हुई है कि कार्य का मतलब है अंगो का हिलना डुलना।

तो वामपंथी आता है, आपको बताता है कि किसान फसल उगाता है, आप पैसे देते हो, लेकिन बीच में बिचौलिया, middleman कहाँ से आ गया? इसको हटा दे तो तुम्हें सस्ती सब्ज़ी मिलेगी। यही वो किसान को कहता है कि अगर बिचौलिये को हटा दे उसकी सब्ज़ी महँगी बिकेगी।मार्क्स को व उसकी संतानो को आज तक ये समझ में नहीं आया कि व्यापारी की आय आती कहाँ से है। बच्चे की तरह puzzled है ये लोग, कि मस्त बैठा हुआ ये व्यक्ति (व्यापारी) उत्पादक से अधिक धनी क्यूँ है।रहस्य नहीं है कुछ। व्यापारी वस्तु की उपलब्धता का समय व स्थान बदल देता है। उसके इसी कार्य effort से उसकी कमाई आती है। गेहूं किसान के खेत में उसके गाँव में एप्रिल मई के महीने में harvest होता है लेकिन आपको वो पूरे साल बाज़ार में दुकान पर मिलता है। इसी सुविधा को देने से व्यापारी का धन आता है। ये काम आप भी कर सकते है। लेकिन फिर आप व्यापारी हो जाएँगे व वामपंथी आपको दुष्ट बताएगा। ये काम किसान भी कर सकता है लेकिन वो भी फिर किसान नहीं रहेगा व्यापारी बन जाएगा व वामपंथी का दुश्मन हो जाएगा।

इसीलिए या तो आप या किसान स्वयं व्यापारी बन जाए, या चुप अपना काम करे।आप व्यापारी बनेंगे तो आप को पता चलेगा कि व्यापारी का जीवन वो नहीं है जो आपको दूर से दिखता है। आपने लगाया हिसाब के पूरा मोहल्ला आप से अनाज लेगा, और किसान से उतना अनाज ले आए। अगले सप्ताह बग़ल में एक दूसरी भी अनाज की दुकान खुल गयी व उसने मुनाफ़ा थोड़ा कम कर बेचना आरम्भ कर दिया। आपका पूरा स्टॉक रखा रह गया। या इस वर्ष एक नया घुन आया और आपके स्टॉक को खा गया। या बाढ़ आयी, आपके गोदाम में पानी भर गया व अनाज बेकार हो गया।

सहकारी, cooperative? आप कहेंगे कि किसान सहकारी संस्था बनाकर स्वयं बेचे। फिर वे भी व्यापारी हो जाएँगे न, किसान नहीं रहेंगे। जो समस्याये आपके सामने आयी है, वो सब उनके सामने भी आएँगी। बहुत सहकारी संस्थान बन चुके है। या तो घाटे में जाकर बंद हो गए, या सरकारी सब्सिडी या सरकारी price control के द्वारा पल रहे है।देश में केवल एक cooperative है जो सफलतापूर्वक चल रहा है: Amul. लेकिन उसे चलाने वाले किसान नहीं है, professionals है। किसान उसके सदस्य अवश्य है। और उसे चलता देख नौकरशाहों ने उसे क़ब्ज़ाने के बहुत प्रयास किए, लेकिन कूरीयन के कारण असफल हो गए। अमूल में किसानो के बेटे ही नौकरी करते है कर्मचारी स्तर पर। वामपंथीयो ने उनसे भी कई बार हड़ताल करवायी।फिर नौकरशाहों ने कहा कि हम भी अमूल खड़े कर सकते है। अन्य प्रदेशों में किए। उनके सारे डेयरी cooperative घाटे में चल रहे है, टैक्स के पैसे पर जीवित है।

ऐसे ही बैंक भी वामपंथी की समझ में नहीं आते है। आपको कहता है कि पैसा आपका है, मज़े ये बैंक वाले कर रहे है। बैंक वास्तव में उन दो लोगों का मिलन करवाते है जिनमें एक के पास पैसा है व दूसरे के पास उद्योग का विचार है या अन्य कोई आवश्यकता है। आप कहेंगे कि आप सीधे उसे देंगे, बैंक बीच में कमाई क्यूँ करे। दीजिए, दीजिए। दीजिए ना। जिस दिन वापिस आए पैसा, मुझे फ़ोन अवश्य करिएगा। बैंक वास्तव में रिस्क आपके सिर से उतारकर अपने सिर लेता है व उसी का पैसा कमाता है।

वामपंथी नाम के infantile ठग को सुनना बंद करिए। अर्थव्यवस्था एक self evolving सिस्टम है। सदैव ये least पॉसिबल cost में ही आप तक सामान पहुँचाती है। केवल एक कारक इससे महँगा कर सकता है वस्तुओ को आप के लिए: हिंसा। हिंसा ही अर्थव्यवस्था को least cost point से डिस्टर्ब कर सकती है। हिंसा व्यापारी नहीं रोक सकता। वो राजा का काम है। राजा ऐसा चुनिए जो हिंसा न होने दे व हिंसा करने वाले को दंड दे सके, जो वचन पालन सुनिश्चित कर सके। अपनी सामाजिक व राजनीतिक समस्याओ का ठीकरा अर्थव्यवस्था या व्यापारी के सिर पर मत फोड़िए।