Delhi Pollution: The City Of Loot Is Choking On Its Loot

As cooking gas cylinders have reached villages, people now in the villages may not see the smoke. But those of us who grew up in North Indian villages till 1980s can easily recall the smoke, thick smoke, that hung over the village, and visible to anybody approaching it, in the evenings of December and January.
The living organisms from single cell to complex Homo Sapiens “pollute” their surroundings just by being alive. But the surroundings have power to restore themselves. Wind blows and the foul air gets replaced by fresh air. River flows and self-cleanses.
But both, the wind and the flowing water, have a certain self-cleansing capacity. Pollutants exceeding this limit overwhelm wind and flowing water.
In winter months, earth is colder and so is air in contact with it. So, it doesn’t rise, and so doesn’t blow. So smoke generated by Homo Sapiens stays longer.
Cities enable division of labour, and therefore they always grow. But division of labour also needs trade, and trade by shipping is the cheapest. Therefore big cities all over the world tend to be on the sea coast or close to big water bodies or large rivers.
Before Independence, our biggest cities were coastal cities. Coastal cities have always fast blowing winds.
The Brits left in 1947, and the charlatans of the Left took over. India of interiors started turning uninhabitable, unliveable. But the looters lived in Delhi because it was the capital. They had to keep its law and order and other services running, for their own sake. Businesses need rule of law and safety, so they also started converging on Delhi. As the jobs moved to Delhi, it started growing. That created even more jobs, so it grew even more, and faster.
Wind lost its capacity to supply fresh air to Delhi. Wind got overwhelmed by the looting windbags.
Matter has been made worse by the fact that Delhi is located at the edge of a desert that practically extends to Sahara.
Looters who thought that they can destroy India and enjoy cool retired life in Delhi are now choking. They blame cars, they blame Diwali crackers, but actually they are choking on their loot.
Delhi had no business to grow this large. And had Indian ruling elite been honest and economically literate, Delhi would have never grown to this size. Cities grow on the coasts. Not inland. If the country is governed well. Otherwise everybody tries to huddle close to the guards of the looting elite. At least it is safe there.
There is no solution to Delhi’s pollution. Let the thugs choke, quicker. May be then we will be economically set free, and our taxes will be used to create rule of law all over India.

Update:

प्रोफ़ेसर, ऐक्टिविस्ट, मनरेगा, फ़ूडसिक्यरिटी ऐक्ट, व दिल्ली का प्रदूषण

1. प्रोफ़ेसर व ऐक्टिविस्ट ने हंगामा किया कि लोग भूखे मर रहे है, उन्हें अनिवार्यत रोज़गार दो। तो मनरेगा नाम के फ़्रॉड का जन्म हुआ। प्रोफ़ेसर व ऐक्टिविस्ट ने फिर हंगामा किया कि लोग अभी भी भूखे मर रहे है तो फ़ूड सिक्यरिटी ऐक्ट नाम की मुफ़्तखोरी का जन्म हुआ। कुछ लोग भूखे अवश्य रहते थे भारत में लेकिन वे दूर उड़ीसा व उससे लगे उन एरीया में भूखे रहते थे जहाँ सिंचाई व्यवस्था व कृषि योग्य भूमि दोनो कम थे। हल ये था कि सिंचाई व्यवस्था की जाती व उद्योग लगते जिससे कि भूमि पर निर्भरता कम हो जाती। लेकिन प्रोफेसर व ऐक्टिविस्ट ये भी कहते है उद्योग लोगों का शोषण करते है इसलिए उन्होंने चलते हुए उद्योग भी बंद करा दिए। इसलिए सरकार के पास सिंचाई योजना के लिए भी पैसा नहीं रहा जो उद्योगों पर टैक्स से आता।

2. प्रोफेसर व ऐक्टिविस्ट ने हंगामा किया कि पंजाब में भूजलस्तर कम हो रहा है। हल ये था कि हिमाचल में बाँध बनाकर पाकिस्तान में बह जाने वाला पानी रोका जाता। लेकिन प्रोफेसर व ऐक्टिविस्ट बाँध के घोर विरोधी है। इसलिए सरकार ने आदेश दिया कि पंजाब में धान की फ़सल 15 जून से पहले नहीं बोयी जा सकती।

3. तो पंजाब, हरियाणा, व पश्चिमी उत्तरप्रदेश में भी मनरेगा व फ़ूड सिक्यरिटी ऐक्ट लागू हुए। पहले धान की कटाई मज़दूर करते थे। वे ज़मीन से दराती मिलाकर धान काटते थे। कोई stubble (पराली) रहता ही नहीं था। फ़सल सितम्बर तक ही कट चुकी होती थी। गेंहु के लिए खेत तैयार रहता था। लेकिन मुफ़्त खाने को मिलेगा व दारू के लिए मनरेगा का पैसा अलग से तो कोई क्यूँ मज़दूरी करेगा? मज़दूर नहीं रहे तो किसान हार्वस्टर लेकर आये। हार्वस्टर एक फ़ुट का stubble छोड़ता है व फ़सल भी अब ऑक्टोबर के अंत में कटती है। अतः stubble भी रहता है व अगली फ़सल बोनी है तो उसे जलाना भी पड़ता है।

4. प्रोफेसर स्वयं एक पान की दुकान लगा कर चला नहीं सकते है। लेकिन स्वयं को इतना ज्ञानी मानते है कि कहते है देश उन्हें चलाने दिया जाय। व ऐक्टिविस्ट को समस्या ढूँढने के भी पैसे मिलते है व समस्या के हल के लिए जो योजना बनती है उसमें भी उनका हिस्सा रहता है। नेता व नौकरशाह का तो lifeblood ही योजना है।
लेकिन जो लोग प्रोफेसर व ऐक्टिविस्ट को अपना देश चलाने देते है उनके देश का भी विनाश होता है व वे स्वयं भी धुन्वें में घुटते है।